
आज के युग में नवजात बच्चों में पीलिया एक आम बात है। जन्म के समय अधिकांश बच्चों को पीलिये की बीमारी से घिरे देखा गया है।
पीलिया रोग में बच्चे की आँखें और शरीर पिली पड़ जाती है। ऐसा इसलिए होता है क्योँकि बच्चे का शरीर पूरी तरह विकसित नहीं होता और उसका liver रक्त में मौजूद बिलीरूबिन को छान कर शरीर से बहार नहीं कर पाता है।
इस वजह से बच्चे के रक्त में बिलीरूबिन की मात्रा अधिक हो जाती है। इस स्थिति को जॉन्डिस (jaundice) कहा जाता है।

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कितने दिनों में बच्चों में जॉन्डिस या पीलिये रोग का पता चलता है
साधारणत्या बच्चों में पीलिया रोग (jaundice) का पता 5 दिनों के अंदर चल जाता है। जन्म के बाद अगर बच्चे में जॉन्डिस के लक्षण दीखते हैं तो बच्चे को अस्पताल में ही रोक लिए जाता है ताकि शिशु का सही इलाज समय पे किया का सके।
अस्पताल में बच्चे को शिशु रोग विशेषज्ञ डॉक्टर की निगरानी में रखा जाता है। अधिकांश बच्चों में पीलिया रोग के लक्षण बहुत ही हलके होते हैं और लगभग दो सप्ताह में स्वतः ही समाप्त हो जाता है।
क्या बच्चों में पीलिया खतरनाक/जानलेवा है? (Is jaundice dangerous?)
अधिकांश बच्चों में पीलिये (जॉन्डिस) खतरनाक स्तर पे नहीं पहुँचता है और उपचार के 2 से 3 सप्ताह में ये पूरी तरह ठीक हो जाता है।
लेकिन अगर ये खतरनाक स्तर तक पहुँच जाये तो बिलीरूबिन की अधिकता बच्चे के मस्तिष्क को हानी पहुंचा सकता है। इस स्थिति को kernicterus कहते हैं।
अगर नवजात बच्चे की समय पे उपचार नहीं किया गया तो यह बच्चे के दिमाग को छतीग्रस्त कर सकता या बच्चे की मृत्यु तक हो सकती है।
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नवजात बच्चे में पीलियाई कितने दिनों में ठीक होता है? (How long does jaundice take to go away?)
नवजात बच्चे में पीलिये (जॉन्डिस) ठीक होने में जन्म से 3 से 12 सप्ताह का समय लग जाता है। अगर बच्चे को अच्छे से स्तनपान कराया जा रहा है और समय-समय पे बच्चे के रक्त में bilirubin की मात्रा का का निरक्षण किया जा रहा हो तो बच्चे मैं पीलिये की स्थिति को गंभीर होने से बचाया जा सकता है।

नवजात बच्चे में पीलिया रोग के लक्षण (How can you tell if your baby has jaundice?)
What are the signs of jaundice? - जिन बच्चों को पीलिया या जॉन्डिस होता है उनके शरीर, चेहरे और आँखों का रंग पीला पड़ जाता है। पीलिये का यह सबसे आम लक्षण है। मगर इन सबके आलावा और भी कुछ लक्षण बच्चों में देखे जा सकते हैं जैसे की
- शिशु के पुरे शरीर का पीला पड़ना
- नाखून, हथेलियों और मसूढ़ों का पीला पड़ना
- चिड़चिड़ाना
- बच्चे का लगातार रोना
अगर बच्चों में ये लक्षण दिखे तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।
क्या करें जब बच्चे में पीलिया रोग के लक्षण दिखे
अगर बच्चे में पीलिया रोग के लक्षण दिखे तो इसे बहुत गम्भीरता से लेना चाहिए। जैसा की मैंने पहले बताया है की अधिकांश बच्चों में पीलिया रोग के लक्षण बहुत ही हलके होते हैं, कुछ बच्चों में इनके लक्षण अधिक हो सकते हैं। इसका मतलब बच्चे के रक्त में बिलीरुबिन का स्तर बहुत अधिक हो चूका है। यह अच्छी स्तिथि नहीं है। ऐसी स्थिति में बच्चे को केर्निकेटरस नामक बीमारी हो सकती है। यह बीमारी बच्चे के मस्तिष्क को नुकसान पहुंचा सकता है।
पीलिया होने पे बच्चे को कितनी देर धुप में दिखाना चाहिए? (How long should a baby with jaundice be in the sun?)
अगर हल्का फुल्का jaundice है तो कुछ दिनों तक दिन में चार बार 15 मिनिट तक धुप दिखाना काफी होता है। किसी इलाज की जरुरत नहीं पड़ती और धुप दिखने भर से पीलिया ठीक हो जाती है। धुप दिखाने के लिए बच्चे को सीधे धुप में न रखें। इसके बदले बच्चे को शीशे की खिड़की के बगल में रखें। खिड़की के शीशे से धुप को छन कर बच्चे पे सीधा पड़ने दें।
बिलीरुबिन (Bilirubin) क्या है और ये शरीर में कैसे बनता है? What is Bilirubin and how is it formed in the body?
बिलीरुबिन पिले रंग का एक पदार्थ है जो शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं के टूटने से बनता है। यह एक साधारण शारीरिक प्रक्रिया है। पिले रंग का पदार्थ बिलीरुबिन शरीर से मल मूत्र के माध्यम से निकाल जाता है।
बिलीरुबिन की कितनी मात्र नवजात शिशु के लिए खतरनाक हो सकती है? (What levels of bilirubin are dangerous in newborns?)
बहुत ही तीव्र पीलिये (जॉन्डिस) में बिलीरुबिन की मात्र रक्त मैं 25 mg को पर कर जाती है। अगर इसका उपचार समय पे नहीं किया गया तो यह बच्चे को बहरा (deaf) बना सकती है, इससे बच्चे को cerebral palsy भी हो सकता है या और भी कई तरीके से बच्चे के दिमाग को नुकसान पहुंचा सकता है।

नवजात बच्चे को पीलिये क्योँ होता है? (What is the cause of jaundice in newborn babies?)
नवजात बच्चों में पीलिये तीन मुख्या कारणों से होता है।
- जब बच्चे के रक्त में बिलीरुबिन की मात्रा काफी बढ़ जाती है तब पीलिया होता है। शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं के टूटने पे बिलीरुबिन बनता है। हमारे शरीर में हर दिन असंख्य लाल रक्त कोशिकाओं टूटते रहते हैं और नए लाल रक्त कोशिकाओं बनते रहते हैं। यह एक normal प्रक्रिया है। हमारा शरीर लाल रक्त कोशिकाओं के टूटने पे बना बिलीरुबिन को शरीर से मल और मूत्र के जरिये बाहर निकलता रहता है मगर उन नवजात बच्चों का शरीर जो पूरी तरह विकसित नहीं होते है वे सफलता पूर्वक बिलीरुबिन को बाहर नहीं निकल पाते जिस वजह से उनके शरीर में बिलीरुबिन की मात्रा बहुत बढ़ जाती है।
- छोटे बच्चों में बिलीरुबिन का स्तर इसलिए भी अधिक होती है क्योँकि नवजात शिशुओं के शरीर में अतिरिक्त आॅक्सीजन वहन करने के लिए लाल रक्त कोशिकाएं होती हैं। अतिरिक्त लाल रक्त कोशिकाओं का मतलब, शरीर में अतिरिक्त बिलीरुबिन का बनना। इतने छोटे बच्चों का liver अभी इतना परिपक्व नहीं हुआ होता है की वो बिलीरुबिन की इस बढ़ी हुई मात्रा को शरीर से छान के बाहर निकाल सके।
- कुछ दुर्लभ स्तिथियोँ में जॉन्डिस या पीलिया बच्चों में दूसरे कारणों से भी हो सकता है जैसे की किसी संक्रमण के कारण, पाचन तंत्र के गड़बड़ी के कारण या फिर माँ और बच्चे के रक्त के प्रकार के समस्या के कारण।

कब डॉक्टर से संपर्क करें
जब बच्चे में ऊपर दिए गए लक्षण दिखे तो डॉक्टर से तुरंत संपर्क करें। डॉक्टर शिशु के खून की जाँच के लिए recommend करेगा ताकि रक्त में मौजूद बिलिरुबीन की मात्रा का पता लगाया जा सके। डॉक्टर से आप निम्न कारणों पर भी तुरंत संपर्क कर सकते हैं।
- जन्म के 24 घंटे के अंदर अगर बच्चे मैं पीलिये रोग के लक्षण दिखे।
- अगर बच्चे के शरीर में पीलिये रोग के लक्षण तेज़ी से फ़ैल रहे हैं तो
- अगर बच्चे को तेज़ बुखार है जो की 100 डिग्री फारेनहाइट से अधिक तब
- बच्चे की सेहत दिन प्रतिदिन बिगड़ती जा रही है तो।
- अगर बच्चे के मूत्र (urine) का रंग गहरा हो रहा है तो।
बच्चे में पीलिया रोग का उपचार
अधिकांश बच्चों को पीलिया रोग के लक्षणों में इलाज की जरुरत नहीं पड़ती है। हलके-फुल्के पीलिये रोग के लक्षण एक से दो सप्ताह के अंदर अपने आप समाप्त हो जाते हैं। बच्चे का शरीर कुछ ही दिनों मैं इतना विकसित हो जाता है की वो खुद ही शरीर से अतरिक्त बिलिरुबिन को निकाल सके।
पीलिया में बच्चे को लगातार स्तनपान कराते रहना चाहिए या formula milk देते रहना चाहिए। इससे मल मूत्र के जरिये शरीर से बिलीरुबिन निकाल जायेगा।
जिन बच्चों में पीलिया रोग के लक्षण बहुत ज्यादा (उच्च स्तर) होते हैं उन बच्चों का इलाज फोटोथैरेपी के द्वारा किया जाता है। फोटोथैरेपी एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें नवजात बच्चे के शरीर को फ्लोरोसेंट रोशनी में एक्सपोज़ किया जाता है। फ्लोरोसेंट रोशनी में शरीर में मौजूद बिलिरुबिन टूटने लगते हैं।

कुछ दुर्लभ स्थितियों में बिलिरुबिन का स्तर शरीर में खतरनाक उच्च स्तर तक पहुँच जाता है। ऐसे स्थिति मैं बच्चे को अतिरिक्त खून चढ़ाने की आवश्यकता पड़ सकती है। लेकिन अगर आप थोड़ा सा सतर्कता बरतें तो अपने बच्चे को ऐसे स्थिति से बचा सकते हैं।