होली सिखाये बच्चों को मानवीय मूल्यों का महत्व

होली मात्र एक त्यौहार नहीं है, बल्कि ये एक मौका है जब हम अपने बच्चों को भारतीय संस्कृति के बारे में जागरूक कर सकते हैं। साथ ही यह त्यौहार भाईचारा और सौहाद्रपूर्ण जैसे मानवीय मूल्यों का महत्व समझने का मौका देता है।

होली सिखाये बच्चों को मानवीय मूल्यों का महत्व

होली के त्यौहार का हम भारतियौं को साल भर इन्तेजार रहता है। ये ऐसा खुशियौं भरा समय होता है जब लोग अपने सभी मित्रों और रिश्तेदारों के साथ खुशियों के रंगों में रंग जाते हैं। 

गौर से देखा जाये तो ये त्यौहार समाज में मौजूद ऊंच-नीच, गरीब-अमीर जैसी दीवार को (कुछ समय के लिए सही) तोड़ देती है और साथ ही बच्चों को एक महत्वपूर्ण शिक्षा भी देती है की इंसान की पहचान उसके काम से होती है ना की उसके जात पात या धर्म-मजहब के आधार पे। 

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इस उत्साह और उमग भरे त्यौहार की तयारी में लोग महीने भर से जुट जाते हैं। सामूहिक रूप से सभी लोग मिल कर के लकड़ी, उपले आदि इकट्ठा करते हैं ताकि फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा के दिन, शाम के वक्त होलिका दहन कर सके। 

बच्चे बड़ों के व्यहारों को देख कर उनसे बहुत कुछ सीखते हैं। इस प्रकार से सामूहिक रूप से मिल कर के त्यौहार की तयारी करने से बच्चों में team work की भावना का सृजन होता है। 

होली के दिन शाम को होलिका दहन के के वक्त लोग नृत्य और लोकगीत का आनंद लेते हैं। ये एक ऐसा समय होता है जब बच्चों को अपने संस्कृति से जुड़ने का मौका मिलता है। जाहिर है इन सारी गतिविधियौं को देख के बच्चों के मन में बहुत सारे सवाल उठते हैं। 

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यही मौका है जब माँ-बाप अपने बच्चों की जिज्ञासा को शांत करते वक्त उन्हें भारत के संस्कृति के बारे में बता सकते हैं ताकि उन्हें अपनी संस्कृति और अपनी पहचान पे गर्व हो। 

भारत एक धर्म- निरपेक्ष देश है, जहाँ सभी धर्मों के लोगों को अपने- अपने धार्मिक त्योहारों को स्वच्छंदता से मनाने का अधिकार है, वहीँ समाज के विभिन्न वर्गों को अपने- अपने रीति- रिवाज़ों का पालन करने की स्वतंत्रता भी है। 

हम सभी लोग स्वयं को प्रसन्न रखने के लिए अवसरों की तलाश में रहते हैं। समाज में रहने के कारण अपने लोगों के साथ मिल बैठकर समय बिताने के लिए विभिन्न प्रकार के आयोजन करते हैं। 

इस प्रकार परस्पर संबंधों में घनिष्ठता बढ़ती है, जिससे मस्तिष्क से तनाव, क्रोध, ईर्ष्या, आदि बुरी भावनाएं दूर होती है और भविष्य के लिए एक सुन्दर वातावरण तैयार होता है। 

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भारतीय संस्कृति और परम्पराओं पर निगाह डालें तो हम पाते हैं कि परिवार में चाहे विवाह समारोह हो, बच्चे का जन्म, फसल की कटाई, व्यापार में लाभ या युद्ध में विजय हो इन सभी अवसरों पर हम प्रसन्नता व्यक्त करते हैं  और रही त्योहार की बात तो वह मनुष्य के लिए सुख और आनंद का श्रोत रहा है। 

अपने परिचय में आने वाले सभी लोगों को इसमें सम्मिलित करना चाहता है। सभी धर्मों में ऐसे त्योहारों की एक श्रृंखला है। अधिकतर त्योहार ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित होते हैं। जिसमें से होली का तो अपना खास ही महत्व है। होली का नाम आते ही बच्चे और बड़ों में खुशियों का संचार होता है।

होली का त्योहार भारतीय संस्कृति का संवाहक हैं।  होली सद्भावना ,भाईचारा और आपसी प्रेम का प्रतीक हैं। होलिका दहन के माध्यम से व्यक्ति अपनी सारी  बुराइयों को जड़ से जला देता हैं। अपनी सारी कटुता को भुला देता हैं।

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होली का त्योहार अलग -अलग प्रांतो में अलग -अलग तरीके से मनाया जाता हैं। कही-कही फूलों के माध्यम से भी होली होती हैं।

उत्तर भारत में तो रंग , गुलाब ,अबीर ,कीचड़ आदि से होली होती हैं शाम के समय में नए कपड़े पहन कर लोग एक दूसरे के घर मिलने जाते हैं और एक दूसरे के गले मिलते हैं।इसका मुख्या पकवान गुजिया हैं , जो मैदे में खोवा भरकर बनाते हैं कहीं- कहीं ठंडाई और भांग पीने की भी प्रथा हैं।

होली भाईचारे तथा रंगो का  त्योहार  हैं।यह  त्योहार  फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता हैं। होली के इस  त्योहार के पीछे एक पौराणिक कथा हैं - राजा हिरण्यकश्यप, भगवान की पूजा का विरोधी था। 

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उसके राज्य में जो ईश्वर की उपासना करता था , वह उसे मृत्यु - दंड देता था। उसका पुत्र प्रह्लाद भी भगवान का उपासक था। इस बात से क्रोधित होकर हिरणकश्यप ने उसे मारने के अनेक प्रयास किये , परन्तु असफल रहा।हिरणकश्यप की एक बहन थी , जिसका नाम होलिका था।

उसे यह वरदान प्राप्त था की वह आग में नहीं जल सकती।हिरणकश्यप के कहने पर वह प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर चिता पर बैठ गई। ईश्वर की कृपा से प्रह्लाद का बाल भी बांका नहीं हुआ और होलिका जलकर राख हो गई। तभी से होली से एक दिन पहले लोग होलिका जलाते हैं।

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होली के समय किसानों की फैसले तैयार हो चुकी होती हैं और वे नयी फसल की ख़ुशी में गेहू की बालिया होलिका दहन  के समय आग में भूनते हैं और एक - दूसरे से गले मिलकर उन्हें वह अनाज देते हैं।इस दिन खूब नाच - गाना होता हैं और खुशियां मनाई जाती हैं।

होलिका दहन के अगले दिन 'फ़ाग ' खेला जाता हैं ,जिसे 'धुलेंडी 'भी कहते हैं।इस दिन सभी लोग एक - दूसरे को रंग -गुलाल आदि लगाते हैं और गले मिलते हैं। 

छोटे - बड़े सभी इस त्योहार को मिल - जुलकर मनाते हैं। कहते हैं कि इस दिन शत्रु को भी रंग व गले लगाकर मित्र बना लिया जाता हैं। 

दुश्मनी भूलकर सभी हर्ष और उमंग से होली खेलते हैं तथा मिठाई खाकर खुशियां मनाते हैं।मथुरा , वृन्दावन में होली विशेष रूप से मनाई जाती हैं।बरसाने की लट्ठमार होली तो पूरे विश्व में प्रसिद्ध हैं ,जिसे देखने लोग दूर – दूर  से आते हैं।इस त्योहार  में कृष्ण की लीला -  भूमि, रंग व् मस्ती से झूम उठती हैं। तभी किसी कवि ने लिखा -

 "होली खेलते हैं गिरिधारी , बाजत ढोल और मृदंग "

कुछ लोग रंगो के स्थान पार कीचड़ , पेंट और रसायन आदि का प्रयोग करते हैं ,जिससे चेहरे और शरीर के अंगो पर जलन होने लगती हैं तथा वह दाग -धब्बों से भर जाता हैं।

ऐसा करने से इस रंगीन और मस्ती भरे त्योहार का रंग फीका हो जाता हैं।कुछ लोग इस त्योहार पर शराब और भांग जैसी नशीली चीजों का सेवन भी करते हैं ,जो गलत हैं। हमें ऐसा नहीं करना चाहिए।  

आप को होली के त्योहार में अपने बच्चों का खास ध्यान रखना चाहिए  क्योंकि रंग में विभिन्न प्रकार के केमिकल हैं जो त्वचा और आखों को बहुत नुक्सान पहुंचाते हैं। 

उन्हें आर्गेनिक रंग या सिर्फ गुलाल से सूखी होली खेलनी चाहिए। सबसे अच्छा उपाय है, फूलों से होली खेलना। इस ऋतू में प्रक्रति भी फूलो से सजी होती हैं , गेंदे का फूल पर्याप्त मात्रा में मिल जाता हैं उनकी पंखुरियों को अलग कर के उससे भी होली खेला जाता हैं। इससे पानी की भी बचत होगी और स्वास्थ की दृष्टि से भी अच्छा होगा। 

आज के सन्दर्भ में इन त्योहारों का महत्त्व और भी बढ़ गया हैं। आज जहाँ चारों ओर आतंकवाद का तांडव नृत्य, हर समय मौत का भय बन लोगो को भयभीत कर रहा हैं ,वही पग -पग पर भ्रष्टाचार , धोखा , धर्म -जाति के नाम पर बिखराव - टकराव हर कही देखने को मिलता हैं। 

विज्ञान के नित नूतन आविष्कारों ने मानव को आत्म- केंद्रित बना दिया हैं ,आधुनिकता की अंधी दौड़ ने उसे स्वार्थी बना दिया है। ऐसे समय में, इन त्योहारों का महत्व पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गया है। 

लोगों के त्योहार और रीति- रिवाज़ का स्वरुप अलग- अलग है, पर हमने उन्हें ऐसा आत्मसात किया कि दोनों का अंतर ही लुप्त हो गया। हम इन्हें साधनों के अनुसार घटा- बढ़ा कर मनाते हैं। 

व्यस्ततम मानव जीवन में शांति,  भाईचारा,  मेल-मिलाप, हंसी- खुशी से एक- दूसरे के साथ मिल- बाँट कर जीवन जीने का भाव तभी उत्पन्न होगा जब मनुष्य इन त्योहारों को मिल-जुलकर मनाएगा। 

धर्म, जाति- भेद, धनी- निर्धन, सेवक- स्वामी का भाव मिटाकर जब तक उदार ह्रदय से इन त्योहारों को नहीं मनाएंगे तब तक हमारे बीच भाईचारा, सौहाद्रपूर्ण वातावरण पनप नहीं पायेगा। 

अतः, हम अपने बच्चों को आपसी मित्रता का पैगाम देते हुए नुकसानदेह रंग के स्थान पर आर्गेनिक रंग और फूलों से होली खेलने के लिए प्रेरित करते हैं और भाईचारे की एक मिसाल कायम करते हैं। 

तो आइये इस वर्ष, होली के त्योहार को एक अनूठे अंदाज़ में मनाते हैं। होली की शुभकामनाओं सहित .....